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चमड़े की कोशिकाओं से जेनेटिक वैज्ञानिकों ने बनाया दिल की कोशिका

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  • পোষ্ট করেছে : Saturday, 5 October, 2019
  • ৭ জন দেখেছেন
  • जेनेटिक्स की दुनिया में हृदय रोग उपचार का नया तरीका
  • क्रांतिकारी उपलब्धि साबित हो सकती है
  • कोशिकाओं का गहन अध्ययन किया गया
  • परीक्षण के बाद ही इस्तेमाल में लाया जाएगा
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः चमड़े की कोशिकाओं को बदलने में वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।

इन जेनेटिक्स के वैज्ञानिकों ने चमड़े की इन कोशिकाओं को हृदय के अंदर की कोशिकाओं में बदलने में कामयाबी पायी है।

इस बदलाव से अब हृदय की बीमारियों का ईलाज और आसान हो सकता है।

इसे जेनेटिक्स की दुनिया में एक क्रांतिकारी उपलब्धि के तौर पर आंका जा रहा है।

इस दिशा में शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने गहराई से दिल की कोशिकाओं की संरचना का अध्ययन किया था।

यह पाया गया था कि इसमें करीब पांच सौ अलग अलग किस्म के जेनेटिक विविधताएं हैं।

इनमें से हरेक के जिम्मे कुछ न कुछ महत्वपूर्ण काम होता है।

इन्हीं की मदद से इंसान अथवा किसी अन्य प्राणी का दिल लगातार धड़कता रहता है।

इनमें से किसी में भी गड़बड़ी होने पर दिल की बीमारी हो सकती है और हार्ट अटैक भी आ सकता है।

शोध के क्रम में यह भी पाया गया है कि इन कोशिकाओं का सीधे तौर पर शरीर के प्रोटिन के निर्माण की संरचना में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती है।

वे प्रोटिन की संरचना का विश्लेषण अथवा उनका विखंडन भी नहीं करते हैं।

इसी वजह से अब तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वे दरअसल दिल की गतिविधियों को नियंत्रित कैसे कर लेते हैं।

चमड़े की कोशिकाओं पर यह काम कैलिफोर्निया के संस्थान ने किया है

इनकी संरचना का गहन अध्ययन कर लेने के बाद वैज्ञानिकों ने इसके विकल्प पर काम प्रारंभ किया था।

यह काम कैलिफोर्निया के सॉन डियागो स्कूल ऑफ मेडिसीन में किया गया था।

वहां के शोध कर्ताओं ने यह पाया कि चमड़े के कोष की भी सात अलग अलग प्रजातियां होती है ।

उन सभी प्रजातियों के गुण दोष और जेनेटिक संरचना का गहन अध्ययन कर उन प्रोटिन को खोज निकाला।

इस प्रोटिन का नाम एनकेएक्स 2-5 है।

यही दरअसल हृदय की धमनियों को सक्रिय रखने में अहम भूमिका निभाता है।

इसके बाद उसी दिशा में शोध को आगे बढ़ाया गया।

इस बारे में नेचर जेनेटिक्स की पिछले माह की पत्रिका में एक शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया है।

इसमें विस्तार से कई बातों की जानकारी दी गयी है।

शोध के तहत उन तमाम जेनेटिक प्रक्रियाओं का एक एक कर पता लगाया गया जो हृदय के प्रोटिन से ताल्लुक रखते हैं।

वैज्ञानिकों ने सामान्य समझ की भाषा में यह बताने की कोशिश की है कि यह प्रोटिन यानी एनकेएक्स 2-5 दरअसल एक स्वीच जैसा काम करता है। यहां से निर्देश प्राप्त होने के आधार पर अनेक जीन चालू अथवा बंद हो जाते हैं।

इस बात की पुष्टि होने के बाद आगे की कार्रवाई के बारे में शोध प्रबंध के वरिष्ठ लेखक डॉ केली ए फ्रैजर ने बताया कि

प्रोटिन के निर्देश को प्राप्त करने लायक नई कोशिकाओं का निर्माण चमड़े की कोशिकाओं में करने का काम किया गया।

डॉ केली वहां के पेडियाट्रिक्स विभाग के प्रोफसर हैं और जिनोम मेडिसीन विभाग के निदेशक हैं।

शोध के लिए एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों के नमूने लिये गये

प्रारंभिक चरण में एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों के सात लोगों के चमड़े के नमूने एकत्रित कर इस शोध को आगे बढ़ाया गया।

इन कोशिकाओं को एक खास किस्म के स्टेल सेल के संपर्क में लाया गया।

इस किस्म के स्टेम सेल को प्लूरिपोटेंट स्टेम सेल कहा जाता है।

यह दरअसल इस बदलाव की प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं।

वैज्ञानिकों ने पहले ही इस बात की पुष्टि कर ली थी कि इस किस्म के स्टेम सेल आवश्यकतानुसार खुद की संख्या को बढ़ा सकते हैं ताकि अपेक्षित लक्ष्य को हासिल किया जा सके।

इनमें यह गुण भी विद्यमान होता है कि वे अलग अलग कोशिकाओं की अच्छी तरह पहचान भी कर पाते हैं।

इसी की मदद से चमड़े के सेल को जेनेटिक और अन्य प्रक्रियाओं के माध्यम से इन सेलों के गुणों को बदला गया।

इसी बदलाव की वजह चमड़े के सेल धीरे धीरे हृदय की कोशिकाओं में परिवर्तित होते चले गये।

शोधकर्ताओं ने हर दौर के इस बदलाव को ध्यान से दर्ज किया और आवश्यक सुधार भी किये।

इसी निरंतर प्रयोग की वजह से अंततः चमड़े की कोशिकाओं को हृदय की कोशिकाओं में बदल पाना संभव हुआ।

प्रयोगशाला में इसके सफल होने के बाद भी इसे व्यवहार में लाने के पहले कई अन्य परीक्षणों से गुजरना होगा।

ताकि व्यवहार में लाने के पहले उनके गुण-दोषों का अच्छी तरह पता चल सके।

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