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पेट काटा दुर्गा पूजा इसलिए क्योंकि मूर्ति का पेट काटकर निकाली गयी बच्ची

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  • পোষ্ট করেছে : Wednesday, 2 October, 2019
  • ১৪ জন দেখেছেন
  • गदापुर में दुर्गापूजा का अलग महत्व अभी भी बरकरार है
  • अब तो देश विदेश के पर्यटक भी पूजा देखने आते हैं
  • जंगीपुर श्मशान घाट पर होता है विसर्जन
पराग मजुमदार

मुर्शिदाबाद: पेट काटा दुर्गा पूजा को हममें से बहुत लोग जानते भी नहीं होगे।

लेकिन मुर्शिदाबाद के इलाकों के पुराने लोग काफी श्रद्धा के साथ इस पेट काटा दुर्गा पूजा का नाम लेते हैं।

दरअसल किवंदति हैं कि वहां स्थापित दुर्गा प्रतिमा का पेट काटकर एक जीवित बच्ची को निकाला गया था।

उसी घटना की वजह से यहां की दुर्गा पूजा का नाम पेट काटा दुर्गा पूजा रखा गया है।

यह कहानी आज भी सुनी जाती है। इसलिए, रघुनाथगंज में गडापुर का इतिहास इस विचित्र पेट काटा दुर्गा को घेरे रहता है।

इस पूजा को देखने और उसमें शामिल होने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं।

इसकी ख्याति अब धीरे धीरे फैलने की वजह से दुर्गा पूजा के मौके पर देश विदेश के पर्यटक भी इस पेट काटा दुर्गा पूजा में शामिल होने चले आ रहे हैं।

सदियों पुराने गदापुर के बनर्जी परिवार का यह दुर्गा पूजन अब सार्वजनिक हो चुका है।

भक्तों की आस्था से जागृत दुर्गा पूजा पूरे धार्मिक रीतरिवाज से आयोजित किया जाता है।

गांव में पूजा करने वाले लोग इसकी पूजा में शामिल होने के लिए पहले से स्थापित सारी धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं।

इसकी कहानी भी कम रोचक नहीं है।

इस परिवार में देवी की प्रतिमा का निर्माण प्राचीन धार्मिक परंपरा में “पेट काटा दुर्गा” की संरचना में मिट्टी डालने के तुरंत बाद शुरू हुआ था।

यह गडादपुर क्षेत्र है, बस पक्की सड़क के दाहिनी ओर है। आखिरी नदी गांव से होकर बहती थी।

पेट काटा दुर्गा पूजा पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का क्षेत्र रहा है

यह इलाका जंगीपुर का है, जहां से कभी भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी चुनाव लड़ा करते थे।

अभी उनके पुत्र भी उनकी राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं।

इसी जंगीपुर इलाके के रघुनाथगंज शहर से करीब आठ किलोमीटर की दूरी पर है यह गांव आहिरन।

इस गांव के दाहिने से एक रास्ता है। उसी रास्ते पर आगे बढ़ने पर गदायपुर का गांव आता है।

गांव के बगल से ही आखिरी नदी बहती है। उस समय के धार्मिक परंपरा के मुताबिक इसी नदी से मिट्टी लाकर प्रतिमा गढ़ने का काम प्रारंभ किया जाता था।

इसी क्रम में अनेक कालखंड के अनेक इतिहास इस पूजा के साथ जुड़ते चले गये हैं।

प्राचीन काल से, इस नदी के सीने से मिट्टी उठाकर दुर्गा की मूर्ति बनाने की प्रथा शुरू हुई।

लगभग नौ फीट लंबाई और तेरह फीट चौड़ी इस पूर्व देवी की प्रतिमा हर साल एक जैसी होती है।

कुछ सौ साल पहले इस पेट काटा दुर्गा पूजा की शुरुआत तत्कालीन बनर्जी परिवार के हाथों से हुई थी।

और तब से यह पूजा से जुड़ा हुआ है।

किंवदंति है कि पूजा के लिए बनर्जी परिवार के मुखिया ने एक गरीब ब्राह्मण को पुजारी नियुक्त किया था।

वह अपनी पत्नी और बच्ची के साथ पास में ही रहती थी।

यह इंतजाम भी बनर्जी परिवार के मुखिया के द्वारा किया गया था।
उस समय, यह कहा जाता है कि एक वर्ष की पूजा के दौरान वह लड़की दुर्गापूजो में नहीं मिली थी।

लड़की के अचानक गायब होने की वजह से इलाके में लोग इस बच्ची को तलाशने में जुटे हुए थे।

किसी एक वक्त में पूजा के दौरान होने वाली संधि पूजा के दौरान बच्ची के नहीं मिलने से

माहौल काफी तनावपूर्ण बना हुआ था।

जमींदार की पत्नी को देवी ने स्वप्न में दिया था आदेश

पूजा के आयोजक एवं सारे गांव वाले इस घटना से परेशान थे।

बताया जाता है कि बच्ची के नहीं मिलने के बाद उसी रात जमींदार की पत्नी और मंदिर के पुजारी को सपना आया था।

इसी सपने में खुद मां दुर्गा ने जमींदार की पत्नी को बताया था कि मंदिर के प्रांगण में उस सुंदर बच्ची को देखकर खुद उन्होंने ही उसे निगल लिया है।

मां दुर्गा के मुताबिक बच्ची उन्हें इतनी पसंद है, इसीलिए उसे अपने पास रखने का उनके पास कोई दूसरा इंतजाम भी नहीं था।

सपने में ही खुद मां दुर्गा ने इसका निदान भी सुझाया था।

उसी निर्देश पर अगली सुबह एक बकरे के बच्चे की बलि देने के बाद प्रतिमा का पेट काटा गया था।

पेट काटने के बाद वहां से बच्ची सकुशल बरामद हुई थी।

तब से इस पूजा को पेट काटा दुर्गा पूजा के नाम से ही जाना जाता है।

बाद मे बदलाव के दौर में अब बकरे की बलि के बदले फलों की बलि दी जाती है।

जहां पर इस पेट काटा दुर्गा पूजा का आयोजन होता है, उसकी ठीक पीछे एक तालाब भी है।

पूजा के मौके पर दूर दराज से आने वाले श्रद्धालु इसी तालाब में स्नान के बाद देवी के दर्शन के लिए जाते हैं।

प्रचलित परंपरा के मुताबिक दशमी के दिन ही नाव पर देवी को सवार कर रघुनाथगंज के सदर घाट पर लाया जाता है।

वहां से यह नाव भागीरथी नदी के तट पर पहुंचती है।

इसी स्थान पर अन्य प्रतिमाओं का भी विसर्जन होता है।

इसी स्थान पर ऐतिहासिक और पारंपरिक पेट काटा दुर्गा पूजा की प्रतिमा का जंगीपुर के श्मशान घाट पर विसर्जन किया जाता है।

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